Thursday, August 27, 2015

एक नया संसार A New World

पूर्णागिरि पर्वत,
उसके शिखर पर मंदिर,
सौ कदम नीचे बांज का पेड़,
उसके नीचे छोटा, सुन्दर फर्न-पादप,
और उसकी छतरी तले
अनजानी, अन-पहचानी वनस्पति
कलाई घड़ी की सुई के बराबर.
उससे टपकती ओस की बूँद
जिसमें कल रात पैदा हुआ
अदृश्य-सा मेरा दोस्त
आज दो नन्हों को जन्म देकर
सुस्ता रहा था.

अचानक मंदिर का घंटा बजा,
कम्पन हुआ,
फर्न हिला,
सूक्ष्म शलाका हिली,
बूँद हिली.
फिर घंट बजा,
बूँद हिली, और हिली,
हिली और गिर गई.
नन्हे खुश थे, दोस्त शांत.

आज रात का आखिरी घंटा
बज चुकने के बाद
मेरे दोस्त के बच्चे
एक नई ओस बूँद में
नया संसार रचेंगे!

Tuesday, August 18, 2015

Famila: a charcoal painting

I composed this one long back, and gave it the name FAMILA. Some lines that needed to go remained and some more have since appeared because of aging and folding of canvas.


Sunday, August 2, 2015

Me and my time मेरा देश, मेरा काल

Have seen the mighty eat dust, so can't think of even trying to measure my expanse and my time. Like a weaver bird, I've limited ambitions that I'm trying to live up to.

I'm impressed with the tireless weaving that the weaver bird does in one season but discards the nest the next season, not ruing her labour lost. I posted another poem on the weaver bird long ago.  

आकाश को छूकर नहीं देखा कभी.
क्षितिज ही है लक्ष्मण -रेखा अभी.
युग काल की गिनती करूंगा मैं शुरू,
हो चुकेगा उम्र का लेखा, तभी.

नदी के तट आ चुकी है रेत जो,
अमर दिखते पर्वतों का प्रेत तो.
मेरी नियति है बस उभरना डूबना,
मैं नदी के तीर सोया खेत, हो.

बादलों ने धारा धोई तर-बतर
खो गए कुछ चमक, कुछ गरज कर.
ओस की मैं बूँद चुप-चुप बिखरती,
कब बनी, कब मिट गई किसको खबर.

ईंट-पत्थर ढो न सकती मैं बया,
नीड़ लेकिन कब अधूरा रह गया.
देश मेरा, काल मेरा जब तलक
घोंसले में मैं लगाती तृण नया!