Wednesday, October 29, 2014

कैसा प्रकाश?

क्यों उस प्रकाश की चाह
देख जिसको दुखती आँखें,
तारों पर लगता पलक-ग्रहण,
छिपता ब्रह्मांड रक्तिम अंधियारे में?
क्यों इस अंधकार की चाह?

फिर,
क्यों उस अंधकार की चाह
कि न हो खुद तो खुद का अहसास,
न आगे पीछे कुछ.
न पथ,
न संकेत पथ के,
रिक्त कालिमा चतुर्दिक?

क्यों न हो मंद-मंद प्रकाश,
हों सांवली सी छायाएँ?
न मतिभ्रम, न दिग्भ्रम ही?
सार्थक उज्ज्वलता, शिव-सुन्दर:
धुली धूप देखे ज्यों बादल के घूंघट से
बिखरे,
बन इन्द्रधनुष.

Thursday, October 23, 2014

Is there a lamp?

Is there a lamp


That brightens
The earth,
The skies,
The sun?

Lightens up

The rays,
The substance,
The space?

Removes darkness

Within,
Without,
Beyond?

Is there a lamp

That stays lit 
When nothing is left;
No wick, no oil, no pot?

Saturday, September 6, 2014

नाप / measurement

कब से सोच रहा था नापूंगा खुद को.
जब भी याद आया,
फीता नहीं मिला. 

घर का कबाड़ साफ़ करते करते
आखिर फीता आज मिल गया.

सोचता हूँ
आज कुछ उछल-कूद हो जाए,
कुछ मस्ती की जाए.

इस बीच 
कद बढ़ाने की कुछ कसरत कर ली जाए. 

फीता जब मिल गया है
तो जल्दी क्या है खुद को नापने की?
जब दर्जी सिलेगा नए वस्त्र
तब नपूंगा ही.

Friday, March 14, 2014

A pair of eyes

A new blind man has lost
All names
And all places,
In the crowd
Of  blinds
Pushing one another
In search of names
And places.

Who in this windy field
Is ready to sacrifice
The coziness of this crowd,
And start a new search:
Search for a pair of eyes?