Friday, November 17, 2017

नेति नेति कुछ ऐसे भी

जो था -
न यह था,
न वह था.
क्योंकि कुछ नहीं था,
समय भी नहीं.

 जो है -
न यह है,
न वह है,
न यह-वह होगा,
समय भी नहीं.

सृष्टि के कैमरे में
इस क्षण
जो कतरा कैद हुआ,
उसमें से
यह मायावी क्षण
हटा कर देखा.

जो बचा,
शायद
वह है,
वह था,
वह होगा.  

Sunday, October 15, 2017

कहे ज्योति संगी से

वर्षों पुरानी यह पंक्तियाँ दीपावली के अवसर पर लिखी गई थीं . 

जब हम अपने भावों को कागज़ पर उतारते हैं तो वह कभी-कभी हमें उन आदर्शों की ओर ले जाते हैं जिन्हें हम जीना चाहते हैं लेकिन अपने जीवन में उतार नहीं पाते और न चाहते हुए भी समझौते करते रहते हैं. यह वैसा ही है, जैसे सोशल मीडिया में किसी नेक काम को 'लाइक' करके ज़िम्मेदारी निभा लेना. 

फिर भी, सोच में ही सही, क्यों न कुछ ठीक-ठीक सा जी लिया जाए ?

कहे ज्योति संगी से
जल,
नवज्योति जलाकर,
प्राण से प्राण जिलाकर.

चले हवा, मुड़ जा, मुड़ती जा,
जल, तृण-पत्र बचाकर.
सहन न हो आंधी
तो बुझ जा.
दम्भ में क्यों जलती री,
तू इतराकर?

किसको क्या दिखलाना
खुद को ज्वाल बनाकर?
या अस्तित्व जताना
संसार मिटाकर?

सखी, प्राण दे,
अहम मिटाकर,
प्राण जगाकर. 

Tuesday, September 12, 2017

तीन छुटकियाँ आधुनिक परिवार के नाम

1 प्रवसन

दूर स्वजनों से अलग हम जी रहे हैं
पारिवारिक चादरों को फाड़कर
टोपियां और जूतियां
खुद सी रहे हैं।

2 अपने-पराये

हताशा के क्षण हों,
पराया पास आए,
हाथ बढ़ाए;
अपना दूर हो,
मज़बूर हो,
ऐसा बार-बार होता है।

3 अपरिवार

फूस की छत तोड़कर
दीवारें हिला रहे।
घर तो ना रहा,
खंडहर भी ना रहे।