Tuesday, September 12, 2017

तीन छुटकियाँ आधुनिक परिवार के नाम

1 प्रवसन

दूर स्वजनों से अलग हम जी रहे हैं
पारिवारिक चादरों को फाड़कर
टोपियां और जूतियां
खुद सी रहे हैं।

2 अपने-पराये

हताशा के क्षण हों,
पराया पास आए,
हाथ बढ़ाए;
अपना दूर हो,
मज़बूर हो,
ऐसा बार-बार होता है।

3 अपरिवार

फूस की छत तोड़कर
दीवारें हिला रहे।
घर तो ना रहा,
खंडहर भी ना रहे।  

Sunday, September 3, 2017

किस ओर हो तुम?

किस ओर हो तुम?

मची है धूम इस ओर सरहद के.
हज़ारों जा रहे हैं,
आ रहे हैं हज़ारों.
जिनमें जड़ें हैं,
उड़ रहे हैं.
पाखी जड़ रहे हैं.
तैरने मैं लगे हैं करोड़ों,
विकल,
लहू में, वीर्य में.
जो हर पल
लगे हैं निगलने
खुद गल रहे हैं.

सुना है
सब कुछ मथ रही है
शांति उस ओर.
धमनियों में, चिमनियों में,
भंवरों में,
नभ में, किरणों में.

नक्शा बनाओ,
खींचकर रेखा बताओ,
कहाँ है सीमा तुम्हारी?
किस बूँद में,
किस अंड में,
किस आग-पानी में?
पार करना किसे है?
किस ओर से?

खड़े किस ओर हो तुम?

Saturday, September 2, 2017

दद्दू की फसल

गंगाधर आज फिर मिला
दद्दू से।

बोला,
दद्दू, पिछड़े महीने तुमसे कही थी
दो सौ हफ्ते हैं तम्हारे पास,
काट लो जितणी फसल काटणी है।
तमने तो चार हफ्ते काट डाड़े
गेहूं के खेत से
जई उखाड़ने में।

दद्दू बोला,
तू ठीक बोला रे,
दो सौ हफ्ते में तो
दस नई फसलेँ
धाण-गेहूँ की हो सकैं।

लेकिन गंगाधर,
अपणी फसल तो
जेतनी लागणी थी लाग गयी।
जई जेतनी उखरणी थी उखड़  गयी।

जब एक हफ्ता बचेगा
तो फेर आणा मिलनै।